रविवार, 24 जून 2012

घर का वैद्द

घर का वैद्द


कुलथी के औषधीय गुण

Posted: 23 Jun 2012 05:31 AM PDT

कुलथी को कई रोगों के इलाज में प्रयोग में लाया जाता है और कुछ का विवरण नीचे दिया गया है -

  • श्वेत प्रदर- थोड़ी सी कुल्थी लेकर उसका दस गुना पानी लेकर उसमें कुल्थी उबाले। उसे छानकर आवश्यकतानुसार यह पानी पीना लाभकारी है।
  • मोटापा- 100 ग्राम कुल्थी की दाल प्रतिदिन खाने से मोटापा घटता है।
  • वात ज्वर- लगभग 50-60 ग्राम कुल्थी लगभग 1 किलो जल में चैथाई (250 ग्राम) पानी रहने तक उबालें। फिर उसे छान लें और आवश्यकतानुसार सेंधा नमक व लगभग 1/2 चम्मच पिसी सौंठ लें। इसे पीने से वात ज्वर में लाभ होगा।

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मोंठ के औषधीय गुण

Posted: 23 Jun 2012 05:25 AM PDT

मोंठ को कई रोगों के इलाज में प्रयोग में लाया जाता है और कुछ का विवरण नीचे दिया गया है -

  • अधिक पसीना आना- मोंठ को सेंक लें फिर उसे पीसकर आटा बना लें। इस एक मुट्ठी आटे में 1/2 चम्मच के अनुपात में नमक डालकर भली भाति मिलायें। इसको सुखा ही अत्यधिक पसीना आने बाले स्थान पर मलना लाभकारी है।
  • अनियमित मासिक धर्म- महिलाओं के अनियमित मासिक धर्म से लोबिये का सेवन हितकर रहता है।

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शुक्रवार, 22 जून 2012

मसूर के औषधीय गुण



मसूर को हमारे घरों मे दाल के रूप मे अधिकतर प्रयोग किया जाता है परन्तु इसके कई औषधीय लाभ  है । नीचे इसके औषधीय लाभ का वर्णन किया गया है जिसे प्रयोग कर आप लाभ पा सकतें है ।
  • नेत्र ज्योति- देशी घी में मसूर की दाल छौंककर व तलकर खाने से नेत्रों का प्रकाश बढ़ता है।
  • वमन होना- वात पित्त कफ किसी कारण से वमन होने की स्थिति में मसूर का आटा अनार का रस और शहद समान मात्रा में मिलाकर जल के साथ लेना चाहिये।
  • खूनी बवासीर (रक्तार्श)- प्रातः के भोजन में मसूर की दाल के साथ खट्टी छाछ (मट्ठा) पीने से खूनी बवासीर ठीक हो जाता है।
  • सौन्दर्य एवं चर्म रोग- मसूर पीसकर उसका लेप या उबटन करने से चेहरे का रंग निखरता है और अनेक चर्म रोग दूर हो जाते है।
  • मसूर के सेवन से बहुमूत्र, कब्ज, गैस-ट्रबल, मुख पाक या छाले गले की सूजन (कंठ शोथ) वेदना, प्रदर और सूजन में लाभ होता है।


बाजरा के औषधीय गुण


Posted: 08 Jun 2012 04:27 AM PDT
बाजरा के औषधीय लाभ नीचे दिये जा रहे हैं जिन्हे प्रयोग करके आप निरोगी हो सकते है -
  • गर्भपात में सहायक- गर्म होने के कारण इसका अधिक मात्रा में प्रयोग करने से अनचाहे गर्भ से छूटकारा पाने में सहायता मिलती है।
  • सुपाच्य- जाड़े के ऋतु में इसका सेवन करते समय उचित मात्रा में घी शक्कर गुड़ का प्रयोग करने से सुपाच्य हो जाता है।


ज्वार के औषधीय गुण



ज्वार को कई रोगों के इलाज में प्रयोग में लाया जाता है और कुछ का विवरण नीचे दिया गया है -
  • आमातिसार- ज्वार के आटे की गर्म-गर्म रोटी बनाकर दही से बारीक करके भिगोकर रख दें और कुछ समय के बाद ही रोगी को खिलाने से आमातिसार जाता रहेगा।
  • लकवा (पक्षाघात) जोड़ो में वायु का दर्द या सन्धिवात- उबले हुए ज्वार के दोनो को पीसकर कपड़छन करके रस निकाल ले। तत्पश्चात् उसमें समान मात्रा में रैण्डी का तेल मिलाकर, गर्मकर व्याधि ग्रस्त स्थान पर लेप कर उपर से पुरानी रूई बांधकर सैंक करनी चाहिये। ऐसा रोग की स्थिति के अनुसार कई दिनों तक करने से अनिवार्यतः लाभ होता है।
  • दंत रोग- ज्वार के दानों की राख बनाकर मंजन करने से दांतो का हिलना, उनमें दर्द होना बंद हो जाता है तथा मसूढ़ो की सूजन भी समाप्त हो जाती है।
  • प्रश्वेद - ज्वार के सूखे हुए दानों को भाड़ में भुनवाकर लाही का काढ़ बनाकर पिलाने से शरीर से पसीने आने लगते है। जिसके कारण अनेक विकार दूर हो जाते है।
  • पेट में जलन- भुनी ज्वार बताशो के साथ खाने से पेट की जलन, अधिक प्यास लगना बंद हो जाते है।
  • आधा सीसी- मस्तिष्क के जिस आधे भाग में दर्द हो, उसी ओर के नासा रन्ध्र में ज्वार के पौधे के हर पत्तो के रस में थोड़ा सा सरसों का तेल मिलाकर टनकाना चाहिए।
  • अन्तर्दाह- ज्वार के बारीक पिसे आटे की रबड़ी रात में बनाकर प्रातः उसमे भुना सफेद जीरा डालकर मट्ठे (छाछ) के साथ पिलाना चाहिये।
  • खुजली- ज्वार के हरे पत्तों को पीसकर उसमें बकरी का मेंगनी की अधजली राख व रैण्डी का तेल समान मात्रा में मिलाकर लगाने से खुजली समाप्त हो जाती है।
  • कैंसर, भगंदर (व भयंकर व्रण (घाव)- ज्वार के ताजा, हरे कच्चे भुट्टे का दूधिया रस लगाने तथा उसकी बत्ती बनाकर घावों में भर देने से उक्त भयंकर महाव्याधियों से छूटकारा पाया जा सकता है।
  • धतूरे का विष- ज्वार कांड के रस में दूध व शक्कर सम मात्रानुसार पिलाते रहने से धतूरे का विष शांत हो जाता है।
  • गुर्दे एवं मूत्र विण्डो के विकार में- ज्वार का काढ़ा बनाकर पीने से लाभ होता है।
  • शरीर में जलन- ज्वार का आटा पानी में घोल लें, फिर उसका शरीर पर लेप करे।
  • मुहासे एवं कील- ज्वार के कच्चे दाने पीसकर उसमें थोड़ा कत्था व चूना मिलाकर लगाने से जवानी में चेहरे पर निकलने वाली कीलें व मुहासे ठीक हो जाते है।


मक्का के औषधीय गुण



मक्का को कई रोगों के इलाज में प्रयोग में लाया जाता है और कुछ का विवरण नीचे दिया गया है -
  • पेशाब मे जलन- ताजा मक्का के भुट्टे जल मे उबाल ले। उस पानी को छान ले, फिर उसमें मिश्री मिलाकर पीयें। इससे गुर्दे की कमजोरी पेशाब की जलन में लाभ होता है।
  • पथरी- मक्के के मखोलिये (डींडू) की राख मूत्रल होती है। इसके रोग दशानुसार व्यवहार करने से पथरी गलकर मूत्र मार्ग से निकल जाती है।
  • मोटापा बढ़ाने के लिए- मक्का के भुने हुए फूल्ले खाने चाहिए।
  • जुकाम, खांसी, कुकर खांसी- मक्का के भुट्टे को पीस लें। उसमें आवश्यकतानुसार सेंधा नमक मिला लें। प्रतिदिन 1/4 चम्मच प्रातः दोपहर एवं रात्रि में लें।
  • गुर्दे की सूजन- भुट्टे के बालो के समान ही डण्ठलो का काढ़ा गुर्दे की सूजन में हितकर है।
  • सूजाक बस्थि शोथ- मक्का के भुट्टे के कोमल ताजा रेशो (उपर के बालों) का काढ़ा बनाकर पीने से वेदना का नाश होता है। मूत्र खुलकर आता है। तथा बस्तिशोथ व सुजाक में लाभ होता है।


चावल के औषधीय गुण



चावल को कई रोगों के इलाज में प्रयोग में लाया जाता है और कुछ का विवरण नीचे दिया गया है -
  • अतिसार व ज्वर- चावलो की खीलों (लाजा) को पीसकर सत्तू बनायें और आवश्यकतानुसार दूध या शहद, चीनी, जल आदि मिलाकर स्वादिष्ट कर लें। इस 'लाल तर्पण' कहते है। इसे देशकाल और रोगी की दशानुसार सेवन करने से ज्वर मदात्यय, दाहकता या सीने की जलन, अतिसार आदि में लाभ होता है।
  • आधा सीसी- प्रातः सूर्योदय से पूर्व चावल की खील, 25 ग्राम के लगभग शहद के साथ खाकर सो जाये, ऐसा 2-3 दिन करने से अर्धावमस्तक-शूल (आधा सीसी रोग) दूर हो जायेगा।
  • फोड़े की दाहकता- यदि शरीर के किसी भी अंग पर ऐसा फोड़ा निकला हो जिसमें अग्नि के समान जलन और दाहकता का अनुभव हो रहा हो, तो कच्चे चावलो को पानी में भिगोकर सिल पर पीसकर लेप करना चाहिये। इससे ठण्डक पड़ेगी और रोगी को चैन मिलेगा।
  • भूख न लगना, अग्निमांध- अग्नि पर चावल पकाकर निचे उतारकर 20-25 मिनट के लिये उसमें दूध मिलाकर ढक्कर रख दें। तत्पश्चात् कमजोर और मंदग्नि से पिडि़त युवको को यह पथ्य देना चाहिये।
  • आमाशय या आंत्र का शोथ- जलन (दाहकता) युक्त शोथ अथवा सूजन होने पर चावल की कांजी या चावल का मांड पिलाना लाभदायक रहता है। कांजी बनाने के लिये 1:40 के अनुपात में चावल के आटे में जल मिलाकर तैयार करना चाहिये। स्वाद के लिये दसमें नमक व नींबू का रस भी मिलाया जा सकता है।
  • अतिसार- चावलों का आटा लेई की भाति पकाकर उसमें गाय का दूध मिलाकर रोगी को सेवन करायें।
  • आन्तरिक व्रण- यदि आमाशय का व्रण जठराश्रित आन्तरिक हो तो नमक तथा नीबू का रस नही मिलाना चाहिये।
  • सूजाक, चेचक, मसूरिका, रक्तदोष जन्य ज्वर, जलन व दहकता युक्त मूत्रविकार में नींबू के रस व नमक रहित चावल की कांजी या मांड का सेवन करना हितकर रहता है। यदि पेय बनाने के लिये लाल शालि चावल हो तो अत्युत्तम अन्यथा कोई चावल लिये जा सकते है।
  • चेहरे के धब्बे या झाई पड़ना- सफेद चावलों को शुद्व ताजा पानी में भिगोकर उस पानी से मुख धोते रहने से झाई व चकते साफ हो जाते है और रंग निखर आता है।
  • वीर्य वद्र्वक योग- चावल दाल की खिचड़ी, नमक, मिर्च, हींग, अदरक मसाले व घी डालकर सेवन करते रहने से शरीर में शुद्व वीर्य की आशातीत वृद्धि होती है, पतलापन दूर होता है। यह सुस्वादु खिचड़ी बल बुद्धि वर्द्धक मूत्रक और शौच क्रिया साफ करने वाली होती है।
  • नेत्रों की लाली- सहन करने योग्य गरम भात (उबले चावल) की पोटली बनाकर सेंक करने से वादी एवं कफ के कारण नेत्रों में होने वाली दर्द युक्त लाली समाप्त हो जाती है।
  • मल विकार- चिरवा (चिर मुश या चिड़वा) दुध में भीगोकर चीनी मिलाकर सेवन करने से पतला दस्त (मल भेदन) हो जाता है। किन्तु दही के साथ खाने से मल बंध हो जाता है। अतिसार ठीक हो जाता है। पानी में भली प्रकार धोकर दूध के साथ सेवन करने से चिरवा स्वास्थ्य के लिये हितकर हैै। इसस रंग में निखार आता है और शरीर पुष्ट होता है।
  • गर्भ निरोधक- चावलों के धोवन के साथ साथ धान (चावलों का पेड़) की जड़ पीस छानकर, शहद मिलाकर, पिलाते रहने से गर्भ स्थिति नही हो पाती। यह निदान हानि रहित और सहज है।
  • हृदय की धड़कन- धान की फलियों के पौधो के उपरी भाग को पानी के साथ पीसकर लेपन करने से हृदय कम्पन और अनियमित धड़कन समाप्त हो जाते है।
  • भांग का नशा, मूत्र रेचन, तृषा निवारण- चावल के धोवन में शक्कर और खाने का सोडा मिलाकर रोगी को पिलाने से भंाग का नशा उतर जाता है। पेशाब खुलकर होता है। प्यास शांत करने के लिये इस धोवन में शहद मिला लेना चाहिए।
  • मधुमेह व्रण- चावल के आटे में जल रहित (गाढ़ा) दही मिलाकर पुल्टिस बनाकर लेप कर दें। यह पुल्टिस रोग की दशानुसार दिन में 3-4 बार तक बदलकर बांध देने से शीध्र लाभ होता है।
  • वमन होना- खील (लाजा या लावा) 15 ग्राम में थोड़ी मिश्री और 2-4 नग छोटी इलायची व लौंग के 2 नग डालकर जल मे पकाकर 6-7 उफान ले लें। 1-2 चम्मच थोड़ी देर बाद लेने से वमन होना रूक जाता है। खट्टी पीली या हरी वमन होने पर उसमें नींबू का रस भी मिला लेना चाहिये।
  • शरीर की कान्ति वर्द्धन- चावलों का उबटन बनाकर कुछ दिनों तक नियमित मलते रहने से शरीर कुन्दन के समान दीप्त हो जाता है।


मटर के औषधीय गुण



मटर को कई रोगों के इलाज में प्रयोग में लाया जाता है और कुछ का विवरण नीचे दिया गया है -
  • चेहरे की झांई- कुछ दिनों तक चेहरे पर मटर के आटे का उबटन मलते रहने से झांई और धब्बे समाप्त हो जाते है।
  • आग से जल जाना- ताजा हरे मटर के दानों को पीसकर जले हुए स्थान पर लगाने से अग्नि की जलन शांत होकर जले हुए स्थान पर ठंडक पड़ जाती है।
  • सौन्दर्य वर्धक योग- भूनी हुई मटर के दाने और नारंगी के छिलकों को दूध में पीसकर उबटन करने से शरीर का रंग निखर जाता है।
  • उंगलियों की सूजन- यदि जाड़ो के दिनों में उंगलियों सूज जाये तो मटर के दानों का काढ़ा बनाये और थोड़े गर्म काढ़े में कुछ देर उंगलियों डुबोकर रखनी चाहिए अथवा इसके साथ मीठा तेल मिलाकर उंगलियों को धोना चाहिये।



पुरुषों में सेक्स संबंधी समस्याएं एवं उपचार



आमतौर पर महिलाएं सेक्स संबंधी समस्याओं से घिरी रहती है, लेकिन ऐसा नहीं कि पुरूषों को यौन समस्याएं नहीं होती। पुरूषों में अकसर तनाव संबंधी समस्याओं के कारण यौन समस्याएं होती है। विटामिन बी के सेवन से पुरूष सेक्स संबंधी कई समस्याओं से अपना बचाव कर सकते हैं। बहरहाल, आइए जानते हैं पुरूषों में सेक्स संबंधी समस्याओं के बारे में।
  • पुरुषों में सेक्स समस्याओं की बात आते ही सबसे पहले उन लोगों पर ध्यान जाता है, जो चाह कर भी सेक्स में रुचि नहीं ले पाते हैं या जिनकी सेक्स करने में कोई दिलचस्पी नहीं होती।
  • सेक्स क्षमता में कमी पुरुषों में आम समस्या बन चुकी है। इसके वास्तविक कारण होते हैं सेक्स हॉरमोन टेस्टोस्टेरोन की कमी। पुरुषों में 40 की उम्र के पार होने पर रक्त में टेस्टोस्टेरोन की मात्रा में कमी आना एक आम बात है। हार्मोन में कमी उम्र के साथ जुड़ी समस्या है लेकिन कुछ लोग अपनी उम्र की शुरुआत में ही इससे पीड़ित हो जाते हैं। ये डाइबिटीज या अन्य तनाव संबंधी कारणों से भी पनप सकता है। रक्त में टेस्टोस्टेरोन की कमी से शरीर में थकान, दिमागी परिवर्तन, अनिद्रा के साथ ही सेक्स की चाहत में कमी हो जाती है।
  • यौन समस्याओं में सबसे आम समस्या है पुरुषों में शीघ्रपतन। सेक्स क्रिया के दौरान पुरुष स्खलन होने के साथ ही पुरुष की उत्तेजना शांत हो जाती है फिर चाहे उसकी महिला साथी की कामोत्तेजना शांत न भी हो।
  • ज्यादातर लोगों में सेक्स में दिलचस्पी खत्म होने का सबसे बड़ा कारण इरेक्टाइल डिस्फंक्शन यानी लिंग की मांसपेशियां कमजोर पड़ना है। ये समस्या कई बार विटामिन बी के सेवन न करने से, कई बार बुरी आदतें व लाइफस्टाइल के कारण हो सकती है। कई लोगों में तनाव संबंधी समस्याओं के कारण ऐसा होता है।
  • शराब पीने वालों कोकीन, आदि ड्रग्स लेने वाले लोग सेक्स के प्रति उदासीन होते हैं। मोटापा व्यक्ति को सेक्स से विचलित करता है। कई बीमारियां जैसे- हृदय रोग, एनीमिया और मधुमेह जैसी बीमारियां भी पुरुष को सेक्स के प्रति उदासीन बनाती हैं।
  • तनाव संबंधी समस्याएं या अत्यधिक व्यस्त रहने वाले लोगों का सेक्स जीवन भी उदासीन हो जाता है।
  • बहुत से लोगों को यह भम्र हो जाता है कि एक उम्र के बाद शरीर में सेक्स शक्ति में कमी आ जाती है। लेकिन ये धारणा गलत है क्योंकि यदि इस उम्र के पुरुष अपने स्वास्थ्य की ठीक प्रकार से देखभाल करते हैं तो वह सेक्स का आनन्द उसी प्रकार से ले सकते हैं, जिस प्रकार से एक युवा पुरुष सेक्स क्रिया का आनन्द लेता है।
  • सेक्स इच्छा में कमी कई बार अधिक दवाइयों का प्रयोग करने, शरीर में रोगों का प्रभाव होने, मूत्रनली से संबंधित रोग होने, तनाव होने और मानसिक समस्या के कारण हो सकते हैं।
  • बढ़ती उम्र में पुरूषों में सेक्स इच्छा तेज हो जाना भी एक समस्या है जिसका कारण प्रोस्टेट ग्रंथि का बढ़ जाना है।
पुरूष अपनी यौन समस्याओं से निजात पाने के लिए विटामिन बी का सेवन कर, तनाव संबंधी समस्याओं को दूर कर और पौष्टिक आहार लेते हुए अपनी सही तरह से देखभाल कर सकते हैं।




अस्थमा का घरेलू उपचार



अस्थमा होने पर निम्न घरेलू उपचार अपनाकर आप इसका इलाज कर सकतें हैं और स्वस्थ रह सकते हैं -
  • लहसुन दमा के इलाज में काफी कारगर साबित होता है। 30 मिली दूध में लहसुन की पांच कलियां उबालें और इस मिश्रण का हर रोज सेवन करने से दमे में शुरुआती अवस्था में काफी फायदा मिलता है।
  • अदरक की गरम चाय में लहसुन की दो पिसी कलियां मिलाकर पीने से भी अस्थमा नियंत्रित रहता है। सबेरे और शाम इस चाय का सेवन करने से मरीज को फायदा होता है।
  • दमा रोगी पानी में अजवाइन मिलाकर इसे उबालें और पानी से उठती भाप लें, यह घरेलू उपाय काफी फायदेमंद होता है। 4-5 लौंग लें और 125 मिली पानी में 5 मिनट तक उबालें। इस मिश्रण को छानकर इसमें एक चम्मच शुद्ध शहद मिलाएँ और गरम-गरम पी लें। हर रोज दो से तीन बार यह काढ़ा बनाकर पीने से मरीज को निश्चित रूप से लाभ होता है।
  • 180 मिमी पानी में मुट्ठीभर सहजन की पत्तियां मिलाकर करीब 5 मिनट तक उबालें। मिश्रण को ठंडा होने दें, उसमें चुटकीभर नमक, कालीमिर्च और नीबू रस भी मिलाया जा सकता है। इस सूप का नियमित रूप से इस्तेमाल दमा उपचार में कारगर माना गया है।
  • अदरक का एक चम्मच ताजा रस, एक कप मैथी के काढ़े और स्वादानुसार शहद इस मिश्रण में मिलाएं। दमे के मरीजों के लिए यह मिश्रण लाजवाब साबित होता है। मैथी का काढ़ा तैयार करने के लिए एक चम्मच मैथीदाना और एक कप पानी उबालें। हर रोज सबेरे-शाम इस मिश्रण का सेवन करने से निश्चित लाभ मिलता है।
दमा का अटैक में सावधानी - 
  1. सीधे बैठें और आराम से रहें ।
  2. तुरंत सुनिश्चित मात्रा में रिलीवर दवा लें ।
  3. पांच मिनट के लिए रुकें, फिर भी कोई सुधार न हो तो दोबारा उतनी दवा लें।



मूंग के औषधीय गुण


मूंग के औषधीय गुण

मूंग का प्रयोग कई तरह के रोगों के इलाज में किया जाता हैं और उनमें जो प्रमुख है उनका विवरण नीचे दिया जा रहा है -
  • आग से जल जाना- जले हुए स्थान पर मूगं को पानी में पीसकर लगा देने से जलन समाप्त होकर ठंडक पड़ जाती है।
  • ज्वर के दौरान खाने में - ज्वर में मूगं की पतली सी दाल का पथ्य देना ठीक रहता है। इससे रोगी की स्थिति के अनुसार काली मिर्च, जीरा, अदरक और डाल देने चाहिये। लेकिन छौंक में घी बहुत कम मात्रा में ही ठीक रहता है।
  • दाद, खाज, खुजली, आदि चर्म रोग- इन समस्त रोगो को दूर करने के लिये छिलके वाली मूगं की दाल पीसकर इसकी लुगती रोगी स्थान पर लगनी चाहिये।
  • शक्ति वर्द्धक मोदन- मुंग के लड्डू बनवाकर सेवन करते रहने से शरीर में लाल रक्त कणो की वृद्धि होती है और स्फूर्ति आती है। वीर्य दोष समाप्त हो जाते है।

अरहर के औषधीय लाभ


अरहर के औषधीय लाभ

अरहर एक दाल है जिसके कई औषधीय लाभ है और कुछ का लाभ यहाँ दिया गया है -
  • भांग का नशा- अरहर की दाल का पानी पिलाने से भांग का नशा उतर जाता है।
  • सिर में चकत्ते- चकत्तों को मोटे सूती कपड़े से रगड़कर उन पर पिसी हुई अरहर की दाल का लेप दिन 2-3 बार करें। दूसरे दिन चकत्तों पर सरसों का तेल चुपड़ कर कुछ देर धूप में बैठ जायें फिर अगले दिन लेप करें। ऐसा कुछ दिनो तक करने से चकत्ते हटकर नये बाल उग आयेंगे।
  • अण्ड वृद्धि- अरहर की दाल भिगोकर उसी पानी में उसे पीसकर गर्म कर ले। इसका लेप करने से बच्चे की अंडवृद्धि होने में लाभ होता है।
  • पसीना आना- अरहर की दाल को नमक व सौठ मिलाकर छौंके इसकी मालिश से पसीना आना बंद होता है, सर्दी कंपकंपी लगने पर लाभ होता है।
  • मुख पाक या छाले- गर्मी के कारण या बदहजमी से मुह में छाले हो गये हो तो अरहर की छिलको सहित दाल को पानी में भीगोकर इस पानी के कुल्ले व गरारे करने चाहिए।


उड़द के औषधीय गुण


उड़द के औषधीय गुण


उड़द एक ऐसा अनाज है जो कि कई रोगों के इलाज में काम आता है । कुछ इलाज नीचे दिये जा रहे हैः
सफेद दाग- उड़द को पानी में बारीक पीसकर नियमित रूप से रोग की स्थिति के अनुसार चकत्तों पर लगाने से कुछ माह के भीतर ही मिटने लगते है।
गंजापन- उड़द की दाल को उबाल कर पीस लें। रात को सोते समय इस पिट्ठी का लेप सिर कुछ दिनों तक करते रहने से गंजापन समाप्त हो जाता है।
पित्त शोथ- उड़द पकाकर हलुए की भाति बनाकर उसकी पुल्टिस पित्त शोथ पर बांध देने से पित्त शोथ में शीघ्र लाभ होता है।
चोट या दर्द पर- उड़द के आटे में पिसी हुई सौठ हींग नमक मैनफल मिलाकर तवे पर एक ओर रोटी सेके। कच्ची (दूसरी) ओर से तिल का तेल चुपड़कर गर्म गर्म सहन करने योग्य रोटी स्थान पर बांध देने से चोट या अन्य प्रकार का दर्द समाप्त हो जाता है।
नकसीर और रक्तपित्त- उड़द का पिसा आटा और लाल रेशमी वस्त्र की राख दोनो को जल में मिलाकर मस्तक पर गाढ़ा गाढ़ा लेप करने से रक्त पित्त व नकसीर ठीक हो जाती है।


चना के औषधीय गुण



चना के औषधीय गुण

  1. जलोदर- आधी छटांक चनों को कुछ पानी में उबालकर अघौटा कर लें। यह जल गर्म-गर्म लगभग एक माह तक सेवन करने से जलोदर रोग दूर हो जाता है।
  2. उन्माद- रात्री को भीगी हुई चने की दाल प्रातः पीसकर चीनी व पानी मिलाकर पीने से मस्तिष्क में गर्मी के कारण उत्पन्न उन्माद के लक्षण शांत हो जाते है।
  3. मधूमेह (डायबिटीज)- 25 ग्राम काले चने रात में भिगोकर प्रातः निहारकर (खाली पेट) सेवन करने से मधूमेह-व्याधि दूर हो जाती है। यदि समान मात्रा में जौ चने की राटी भी दोनों समय खायी जाये तो लाभ शीघ्र होगा।
  4. नपुंसकता-  भिगोये हुए चने के जल में (चना निकाल लेने के बाद जो जल रह जाये। शहद मिलाकर पीने से किन्हीं भी कारणों से उत्पन्न नपुंसकता समाप्त हो जाती है और स्तम्भन-शक्ति (सैक्स पावर) में आशातीत वृद्वि हो जाती है।
  5. चने के आटे का हलवा कुछ दिनों तक नियमित रूप से सेवन करना चाहिए। यह हलुवा वात प्रधान श्वास के रोग में लाभकारी है। इस योग के साथ उबालकर ठंडा किया हुआ जल पीयें ताकि हलुआ आसानी से पच सके।
  6. वीर्य वद्र्वक योग- मिट्टी कांच या चीनी के बर्तन में आवश्यकतानुसार रात को चने भिगोकर रख दे। सुबह-सवेरे उठकर खूब चबा-चबाकर खायें इसके लगातार सेवन करने से वीर्य में वृद्वि होती है। तथा अन्य वीर्य-सम्बन्धी विकार समाप्त हो जाते है। स्वाद के लिए उसमें बादाम की गिरी या किशमिश भी भिगोयी जा सकती है।
  7. वीर्य पुष्टि कर योग- भीगे हुए चने खाकर उपर से दूध पीते रहने से वीर्य का पतलापन दूर हो जाता है।
  8. चने की भीगी दाल और शक्कर लगभग 10-10 ग्राम की मात्रा में दोनो मिलाकर 40 दिनों तक खाने से धातु पुष्ट हो जाती है। इस योग के तुरन्त बाद पानी नही पीना चाहिए।
  9. जुकाम- गर्म चने रूमाल या किसी साफ कपड़े में बांधकर सूंघने से जुकाम ठीक हो जाता है।
  10. बहुमूत्रता- बार-बार थोड़ा-थोड़ा पेशाब जाने की बीमारी में भुने हूए चनों का सेवन करना चाहिए। यदि थोड़ा गुड़ भी खाया जाये तो और भी उत्तम है। वृद्व व्यक्तियों को इस रोग में चने का प्रयोग लम्बे समय तक करना चाहिये।
  11. बवासीर- गर्म-गर्म भुने चनों को सेवन नियमित रूप से कुछ दिनों तक करते रहने से प्रारम्भिक स्थिति का 'खूनी बवासीर' ठीक हो जाता है।
  12. पित्ती निकलना- काली मिर्च को चने के बेसन के लड्डू में मिलाकर खाने से पित्ती में लाभ होता है।
  13. हिचकी, आमाशय विकार- चने के पौधे के सूखे पत्तों को चिल्म में रखकर धुम्रपान करने से शीत के कारण आने वाली हिचकी तथा आमाशय की विकृति  में लाभ होता है।
  14. पीलिया- चने की दाल लगभग 100 ग्राम को दो गिलास जल में भिगोकर तत्पश्चात दाल पानी में से निकलाकर 100 ग्राम गुड़ मिलाकर 4-5 दिन तक खायें।
  15. प्रतिश्याम- इसके लिये दिन भर उपवास करने के बाद रात में सोते समय भुने हूए चने खायें, यदि आवश्यक समझे तो उपर से गर्म दूध पी लें। पानी कभी नही पीना चाहिए। यदि इन्ही चनों से पोटली बनाकर गले की सिकाई कर लें तो आराम जल्दी होता है।
  16. बिच्छू का विष- चने के क्षार का लेप दंश स्थान पर करने से बिच्छू का बिष का कोप शांत हो जाता है।
  17. सिर दर्द- 25 ग्राम पिसी हुई राई में 150 ग्राम चने के आटे तथा चने के क्षार में मिलाकर लेप करने से वात जन्य सिर की पीड़ा शान्त हो जाती है। पीड़ा दूर होते ही लेप हटाकर सिर को धो लेना चाहिये।
  18. चर्म रोग- चने के आटे की की नमक रहित रोटी 40 से 60 दिनों तक खाने से चर्म सम्बन्धी विकार -दाद, खाज, खूजली आदि नही होते और हो रहे हो तो ठीक हो जाते है। किन्तु इस कल्प से पुर्व विरेचनादि करके शरीर शुद्व कर लेना चाहिये।
  19. कफ विकृति- भुने हुए चने रात्रि काल में सोते समय चबाकर उपर से गर्म दुध पीने से श्वास नली के अनेक रोग कफ बलगम आदि दूर हो जाते है।
  20. सफेद दाग पड़ना- देसी काले चने 25-30 ग्राम लेकर उनमें 10 ग्राम त्रिफला चूर्ण मिला लें और जल में डुबोकर बारह घंटे तक रख दे। तत्पश्चात 12 घटें को उन्हे किसी साफ कपड़ें में बांधकर रख दें, जिससे वे अंकुरित हो जायें। प्रातः के नाश्ते के रूप में इन्हे खूब चबा चबाकर विभिन्न अंगो पर चकते समाप्त हो जाते है।
  21. नासिका शोध- चने के क्षार को 10 गुना जल में मिलाकर नाक से टपकाना चाहिए।
  22. दंत शोध, पित्त ज्वर- चने के कोमल ताजा पत्तों का शाक या भुजिया खाने से ज्वर, पित्त तथा दांतों के शूल में लाभ होता है।
  23. अति स्वेद (अधिक पानी लगना)- ज्वर की स्थिति में अधिक पसीना आने पर भूने को पीसकर अजवायन तथा बच का चूर्ण मिलाकर मालिश करनी चाहिये।
महिला रोग-
  1. गर्भवस्था की वमन- भूने हुए चनों का सत्तू खिलाने से नारी की गर्भ की स्थिति की वमन शान्त हो जाती है। किन्तु इसका सेवन ग्रीष्म ऋतु में करना चाहिये, क्योकि सत्तू शीत गुण प्रधान होता है।
  2. गर्भपात- गर्भपात की सम्भवना हो तो नारी को काले चनों का काढ़ा बनाकर पिलाना चाहिए, गर्भ स्थिर बना रहेगा।
  3. श्वेत प्रदर (ल्यूकोरिया)- भूने हुए चनों में देशी खांड मिलाकर रख लें। 2-3 चम्मच की मात्रा में खाकर उपर से देशी घी मिश्रित गाय का गर्म दूध पीने से कुछ दिनों बाद ही श्वेत प्रदर (सफेद पानी जाना) बन्द हो जाता है।

जौ के औषधीय गुण


जौ के औषधीय गुण


जौ एक  उपयोगी अन्न है और इसका उपयोग औषधि के रूप  मे किया जा सकता है । जौ के निम्न औषधीय  गुण  है ः
  1. सूजन- यदि शोध के कारण कफ दोष हो तो जौ के बारीक पिसे आटे में अंजीर का रस मिलाकर लगाना चाहिये।
  2. कंठ माला- जौ के आटे में धनिये की हरी पत्तियों का रस मिलाकर रोगी स्थान पर लगाने से कंठ माला ठीक हो जाती है।
  3. मधुमेह (डायबटीज)- छिलका रहित जौ को भून पीसकर शहद व जल के साथ सत्तू बनाकर खायें अथवा दूध व घी के साथ दलिया का सेवन पथ्यपूर्वक कुछ दिनों तक लगातार करते करते रहने से मधूमेह की व्याधि से छूटकारा पाया जा सकता है।
  4. जलन- गर्मी के कारण शरीर में जलन हो रही हो, आग सी निकलती हो तो जौ का सत्तू खाने चाहिये। यह गर्मी को शान्त करके ठंडक पहूचाता है और शरीर को शक्ति प्रदान करता है।
  5. मूत्रावरोध- जौ का दलिया दूध के साथ सेवन करने से मूत्राशय सम्बन्धि अनेक विकार समाप्त हो जाते है।
  6. गले की सूजन- थोड़ा सा जौ कूट कर पानी में भिगो दें। कुछ समय के बाद पानी निथर जाने पर उसे गरम करके उसके कूल्ले करे। इससे शीघ्र ही गले की सूजन दूर हो जायेगी।
  7. ज्वर- अधपके या कच्चे जौ (खेत में पूर्णतः न पके ) को कूटकर दूध में पकाकर उसमें जौ का सत्तू मिश्री, घी शहद तथा थोड़ा सा दूघ और मिलाकर पीने से ज्वर की गर्मी शंात हो जाती है।
  8. मस्तिष्क का प्रहार- जौ का आटा पानी में घोलकर मस्तक पर लेप करने से मस्तिष्क की पित्त के कारण हूई पीड़ा शांत हो जाती है।
  9. अतिसार- जौ तथा मूग का सूप लेते रहने से आंतों की गर्मी शांत हो जाती है। यह सूप लघू, पाचक एंव संग्राही होने से उरःक्षत में होने वाले अतिसार (पतले दस्त) या राजयक्ष्मा (टी. बी.) में हितकर होता है।
  10. मोटापा बढ़ाने के लिये- जौ को पानी भीगोकर, कूटकर, छिलका रहित करके उसे दूध में खीर की भांति पकाकर सेवन करने से शरीर पर्यात हूष्ट पुष्ट और मोटा हो जाता है।
  11. धातु-पुष्टिकर योग- छिलके रहित जौ, गेहू और उड़द समान मात्रा में लेकर महीन पीस लें। इस चूर्ण में चार गुना गाय का दूध लेकर उसमे इस लुगदी को डालकर धीमी अग्नि पर पकायें। गाढ़ा हो जाने पर देशी घी डालकर भून लें। तत्पश्चात् चीनी मिलाकर लड्डू या चीनी की चाशनी मिलाकर पाक जमा लें। मात्रा 10 से 50 ग्राम। यह पाक चीनी व पीतल-चूर्ण मिलाकर गरम गाय के दूध के साथ प्रातःकाल कुछ दिनों तक नियमित लेने से वीर्य सम्बन्धी अनेक दोष समाप्त हो जाते हैं और पतला वीर्य गाढ़ा हो जाता है।
  12. पथरी- जौ का पानी पीने से पथरी निकल जायेगी। पथरी के रोगी जौ से बने पदार्थ लें।
  13. गर्भपात- जौ का छना आटा, तिल तथा चीनी-तीनों सममात्रा में लेकर महीन पीस लें। उसमें शहद मिलाकर चाटें।
  14. कर्ण शोध व पित्त- पित्त की सूजन अथवा कान की सूजन होने पर जौ के आटे में ईसबगोल की भूसी व सिरका मिलाकर लेप करना लाभप्रद रहता है।
  15. आग से जलना- तिल के तेल में जौ के दानों को भूनकर जला लें। तत्पश्चात् पीसकर जलने से उत्पन्न हुए घाव या छालों पर इसे लगायें, आराम हो जायेगा। अथवा जौ के दाने अग्नि में जलाकर पीस लें। वह भस्म तिल के तेल में मिलाकर रोगी स्थान पर लगानी चाहियें।